Wednesday, June 1, 2016

Pravruttī and Nivruttī - Last

The second reason that makes worldly life stressful is the illusion that ‘the world exists for real’ (Jagat-satyatva Bhrānti). Vedic thinking says that the world is ‘illusory’ and ‘imaginary’ (Māyic and kalpit). If every incidence in the world is perceived as real, then the world is believed to be real. The question whether 'an incidence is perceived as real or unreal' can be answered by analyzing our reactions towards it. ‘It is a big bad world out there. The world is ruthless.' These expressions can be routinely heard. Such antagonistic feelings about the world, or strong reactions evoked by some incidents testify the fact that ‘the world is perceived as real’ by us.

Pravruttī and Nivruttī - 1

Mhanoni Pravruttī ani Nivruttī | Iye vojhi na ghe mati |
Akhand chitta vruttī | Majhya thayī || (Dnyaneshwarī 12-121)
(म्हणोनि प्रवृत्ती आणि निवृत्ती | इयें वोझीं नेघें मती | अखंड चित्तवृत्ती | माझ्या ठायी || ज्ञा. १२-१२१)

Saturday, May 14, 2016

अनुग्रह - अन्तिम भाग

“दत्त भार्गव संवाद“ नाम का एक ग्रन्थ हैl उसमें पत्नी गुरु और पति शिष्य हैl गुरु शिष्य की जोड़ी का शिष्य पति ऊँची मीनार पर जा बैठता हैl उसके लिये रस्सी और डोली के द्वारा भोजन आदि सामान ऊपर पहुंचाया जाता थाl वह बाहर बिलकुल देखता नहीं थाl उसने अपने आप को छः महीने तक मीनार में बंद कर रखा थाl वह आँखें बंद करके बैठता था ताकि उसे जगत किसी भी परिस्थिति में दिखाई न देl उसका विचार था कि मिथ्या जगत उसे दिखाई न दे इसके लिये उसके पास एक ही उपाय है कि उस मिथ्या जगत को वह न देखेl पत्नी ने छः महीनों तक उसके यह सब रंग –ढंग चलने दियेl छः महीने बाद उस गुरु रूप पत्नी ने उसे नीचे बुला लिया और उससे एक सुन्दर प्रश्न पूछा कि “आप यह बतायें कि ऐसा क्या है जो आँखें बंद करने पर आता है और आँखें खोलने पर जाता है? क्या आँखें बंद करने पर आपकी आत्मा आती है और खोलने पर चली जाती है? जगत दृष्टिगत न हो इसलिये आपने अपने आप को मीनार में कैद कर लिया लेकिन मीनार के पत्थर तो नजर आये ही ना? ये जो मीनार के पत्थर हैं, वे क्या जगत से अलग हैं? मीनार के पत्थर जगत से ही लाये गए हैंl पत्थर यदि दिखाई देते हैं तो पत्थर के रूप में जगत ही दिखाई देता है इसलिए आँखें बंद करने से काम नहीं चलेगाl” जो भी दिखाई दे रहा है उसे विषय सर्प ने पकड़ रखा है, केवल उसके सत्यत्व का विष हटा देने के बाद जो भी जगत दिखाई दे, उसे वैसा दिखने दोl क्योंकि जगत तो दिखाई देगा ही, उसे दूर नहीं हटा सकतेl जगत को दूर हटाना परमार्थ का उद्देश भी नहीं हैl संसार से भाग जाना भी परमार्थ का उद्देश नहीं हैl बल्कि जगत की तरफ देखने का दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता हैl यह दृष्टिकोण बदलने की बात जब तक हमें नहीं समझती, तब तक परमार्थ जटिल और गूढ़ बना रहता हैl हम ठान लेते हैं कि परमार्थ हमारे सामर्थ्य के बाहर की बात हैl ऐसी गलतफहमी हमारे मन में हमेशा के लिए हो जाती है l इस पर एक ही उपाय हैl अनवरत श्रवण, यथाशास्त्र श्रवण, यथार्थ श्रवणl ऐसा अगर हो पाया तो हमारी सारी गलतफहमियाँ समाप्त हो जायेंगीl उसके बाद ही हम ज्ञानेश्वर महाराज की इस ओवी का रहस्य समझ पायेंगेl एक दूसरा विषय ‘शब्द’ हैl कानों से शब्द सुनाई देते ही रहेंगेl सुनना कानों का धर्म हैl परन्तु वह सुना हुआ शब्द सत्य लगना ही उसका विष हैl शब्द मिथ्या हैं ऐसा यदि हम समझ पायें तो उस शब्द का विष हट जाता हैl उसके बाद निंदा या स्तुति दोनों ही संतों की दृष्टि में एक से होते हैl निंदा हो या स्तुति हो, दोनों ही शब्द कानों द्वारा सुने जायेंगेl कान सुनने का काम करेंगे ही क्योंकि शब्द कानों का विषय हैl अतः इन शब्दों के विषयसर्प की पकड़ टाली नहीं जा सकती l परन्तु चूँकि शब्द मिथ्या हैं यह मुझे ज्ञात है अतः शब्दों का अर्थ मिथ्या हो जाता हैl शब्दों का अर्थ मिथ्या होने पर उसकी अनुकूल या प्रतिकूल प्रतिक्रया नहीं होतीl अनुकूल या प्रतिकूल विचार नहीं होने के कारण हमारा संतोष, शान्ति, सुख, तृप्ति इनमें से किसी में भी कोई बाधा, अड़चन या कमी नहीं आतीl

अनुग्रह - भाग १०

समर्थ स्वामी रामदासजी का प्रसिद्ध वचन है :-
मी कर्ता ऐसे म्हणसी l तेणे तू कष्टी होसी l

अर्थात मैं कर्ता हूँ ऐसा सोचते हो इसीलिये तो कष्ट पाते होl जिस समय हमें यह ज्ञात होगा कि मैं कर्ता नहीं हूँ, उस समय “कर्ता कौन है” ऐसा प्रश्न उपस्थित होता हैl अब इस प्रश्न का उत्तर यदि हमें अच्छी तरह मिल जाएगा तो कर्तृत्व नामक चीज को हम अपने आप से दूर रख सकते हैंl उसके बाद भोक्तृत्व नामक चीज भी अपने आप निकलकर दूर हो जाती हैl और यदि कर्तृत्व – भोक्तृत्व दूर हो जाएँ तो सारी झंझट ही ख़त्म हुई समझोl जब मुझे “मैं भोक्ता हूँ” ऐसा लगता है तो उसके परिणाम स्वरुप ऐसा निश्चित होता है कि मुझे भोगों की आवश्यकता हैl जब मेरे लिये भोगों की आवश्यकता निश्चित होती है तो उन भोगों को उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी मुझ पर है ऐसा भी निश्चित होता हैl उन्हें किस प्रकार प्राप्त करना है यह भी निश्चित होता हैl इस प्रकार आगे एक के बाद एक बात निश्चित होती जाती हैl कर्तृत्व भोक्तृत्व भ्रान्ति के बारे में वेदान्तशास्त्र ने तर्कसंगत पद्धति से विचार प्रस्तुत किया हैl

अब यदि मैं कर्ता नहीं हूँ तो फिर कर्ता कौन है? आत्मा निष्क्रिय हैl वह कुछ भी नहीं करती लेकिन उसकी सत्ता पर ही सभी बातें घटित होती हैंl यह एक बड़ा सच है और इस सच्चाई को ध्यान में रखने की आवश्यकता हैl आत्मा अकर्ता होते हुए भी उसके साक्षित्व में और उसकी सत्ता के बिना कुछ भी घटित नहीं होताl साक्षी बड़ा मजेदार शब्द हैl आत्मा निष्क्रीय साक्षी हैl क्या सक्रीय साक्षी और निष्क्रीय साक्षी में कोई अंतर है? अदालत में साक्ष या गवाही  देने बुलाया जाता हैl अदालत में बुलाया हुआ साक्षी या गवाह अपराध में शामिल नहीं रहता लेकिन उसने अपराध होते समय उसे देखा हुआ होता हैl अर्थात उसने देखने की क्रिया की हुई होती हैl अतः वह सक्रीय साक्षी हैl लेकिन आत्मा निष्क्रिय साक्षी हैl सक्रिय और निष्क्रिय साक्षी के अंतर की यह बारीकी यदि हम ध्यान में रखें, तो आत्मा को किस दृष्टि से साक्षी कहा जाता है यह बात हमें समझ में आ जाएगीl हम जब भी आत्मा साक्षी है ऐसा कहते हैं उसका अर्थ आत्मा निष्क्रिय है ऐसा होता हैl यह बात ध्यान में रखकर हम आत्मा का वास्तविक साक्षित्व जान सकते हैंl व्यावहारिक जीवन में साक्षी चश्मदीद गवाह होता है, घटना को देखने में सक्रीय रहता हैl लेकिन आत्मा कुछ नहीं देखती क्योंकि उसको आँखें नहीं होतीl अतः आत्मा साक्षी होने का अर्थ है कि उसकी सत्ता पर ही सभी कुछ घटित होता हैl आत्मा के साक्षित्व में उसकी कोई क्रिया नहीं हैl आत्मा के साक्षित्व के सन्दर्भ में ‘साक्षी’ शब्द का अर्थ जब भली-भांति समझ में आ  जाता है फिर ‘मैं’ अर्थात आत्मा साक्षी है का सही अर्थ समझ में आयेगाl ऐसे साक्षित्व के साथ यदि हम रह पायें तो भीतरी आनंद अक्षुण्ण रह पाता है, उसमें कोई कमी नहीं आतीl हमारा संतोष कायम रहता है, तृप्ति में कोई कमी नहीं आतीl लेकिन यदि हम साक्षित्व नहीं ला पाए तो हमारा संतोष नष्ट हो जाता हैl घर में होने वाली बातों को जो साक्षित्व की नजर से देख सकता है, उसका जीवन आनंदमय हो जाता हैl

घर शब्द को विस्तार देकर कह सकते हैं कि जिस संसार में हम विचरण करते हैं उसकी घटनाओं की ओर यदि हम निष्क्रिय साक्षित्व से देख सकें तो हमें आनंद की निधि मिल जायेगीl जहां निष्क्रिय साक्षित्व है वहां आसक्ति नहीं होती और जहां आसक्ति नहीं होती वहां आनंद में कोई कमी नहीं रहती, तृप्ति में कोई कमी नहीं होतीl जहां तृप्ति में कमीं आती है वहां दुःख होता है ऐसी वेदान्त की सीधी और सरल विचार पद्धति हैl

हम एक उदाहरण लेते हैl मानिए कि इकलौता बेटा चला गयाl होना तो नहीं चाहिये लेकिन हो गयाl इस घटना को साक्षित्व से अगर देखा जाए तो बेटे के प्रति मेरा ममत्व समाप्त हो जाना चाहिएl उसके प्रति मेरी जो आसक्ति है वह समाप्त हो जानी चाहिएl ‘चला गया’ शब्दों का अर्थ अनेक प्रकार से निकल सकता हैl घर छोड़ कर यदि जाए तो भी चला गया, अपना दूसरा घर बसा ले तब भी चला गया, लड़ाई झगड़ा कर निकल जाए फिर भी चला गया और वास्तव में गुजर जाए तब भी चला गयाl इतने प्रकार से चला गया शब्दों का अर्थ निकल सकता हैl किसी भी अर्थ में समझो यदि चला गया हो तो यह घटना जब घटित हुई तब उसे मैंने साक्षी के रूप में देखाl यदि सक्रीय साक्षी के रूप में देखा हो तो सक्रियता हुई अतः उसके साथ साथ दुःख भी आ ही गयाl लेकिन यहाँ निष्क्रिय साक्षी, जो मैं हूँ, होने के कारण और “तत्वमसि – वह तुम हो“ इस महावाक्य के अनुसार मैं आत्मा हूँl इस यथार्थ श्रवण से मुझ पर जो भ्रान्ति का मैल था उसे धो डालने की व्यवस्था अनुग्रह में हैl यदि अनुग्रह में यह व्यवस्था न हो तो वह सिर्फ एक औपचारिक विधि बन जाता हैl अनुग्रह सिर्फ एक विधि बनकर नहीं रहना चाहियेl उस अनुग्रह का दोनों पक्षों की ओर से अर्थात अनुग्रह देनेवाले और लेने वाले की ओर से पृष्ठपोषण होना चाहिये, उसे बढ़ावा मिलना चाहियेl ऐसा होने पर ही उस अनुग्रह का कोई मूल्य होगाl स्वामी रामदास की सन्दर्भ ओवी “जिस क्षण अनुग्रह लिया उसी क्षण मोक्ष प्राप्त हुआ” का अर्थ यही है कि अनुग्रह देनेवाला और लेनेवाला दोनों यदि अपनी अपनी जिम्मेदारी ठीक से समझे हों तो फिर भ्रम से मुक्त होने में कोई विशेष समय नहीं लगेगाl उसी क्षण मुक्ति होने की व्यवस्था हो गई ऐसा समझने में कोई हर्ज नहींl अतः “तत्वमसि” यह महावाक्य अनुग्रह का एक भाग बन जाता हैl इस बोध के कारण जगतसत्यत्व भ्रान्ति और देह तादात्म्यता से हमें छुटकारा मिलता है और कर्तृत्व भोक्तृत्व भ्रान्ति से भी छुटकारा होता हैl यदि मैं कर्ता नहीं हूँ तो कर्ता कौन है? इसका उत्तर है कि कर्ता जीव हैl आत्मा कर्ता नहीं हैl हम सब में जो जीव नामक तत्व है, वही कर्ता हैl लेकिन मैं जीव नहीं हूँl मैं जीव न होकर, आत्मा हूँ अतः हर घटना का निष्क्रिय साक्षी हूँl जो कुछ भी घटित हो रहा है वह जीव द्वारा किया जा रहा है और वह प्रारब्ध के वशीभूत हो रहा हैl लेकिन वह चाहे जिस तरह से घटित हो रहा है, ऐसी कल्पना करना ठीक नहीं है, बल्कि उसे नियमों और वर्जनाओं की मर्यादा हैl कुछ भी और कैसे भी यदि घटित हो तो वह प्रारब्ध वश हुआ होगा ऐसा समझने में कोई आपत्ति नहीं हैl परन्तु प्रमुख बात है वह अलिप्तता -कि उसका मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं हैl ऐसी अलिप्तता का अभ्यास निरंतर करते रहना ही साधना हैl इस साधना की सामग्री हमें महावाक्य या पर्याय से अनुग्रह द्वारा प्राप्त होती हैl इसलिए तीनों भ्रमों से मुक्ति या निवृत्ति अनुग्रह का एक फल होना चाहियेl एक और बहुत अच्छी बारीकी आपके सामने रखना चाहता हूँl ज्ञानेश्वर महाराज की सुन्दर ओवी हैl इस ओवी का महावाक्य के साथ सम्बन्ध है, अनुग्रह से संबंध है :-

विषयव्याळें मिठी l दिधलिया नुठी ताठी l ते तुझिये कृपादृष्टी l निर्विष होय ll  ( ज्ञानेश्वरी १२ – २ )

इस ओवी का अर्थ है :- विषय रूपी सर्प की पकड़-जो और अधिक मजबूत होती जाती है, से छूटना संभव नहीं हैl ऐसी वही मजबूत पकड़ श्री गुरु की कृपादृष्टि से निर्विष हो जाती हैl

अनुग्रह - भाग ९


 “मेरा शरीर ही मैं हूँ”  ऐसा एक और भ्रम होता हैl अब इस भ्रम से भी छुटकारा पाना हैl इसका अर्थ ऐसा नहीं कि हम अपना शरीर ही छोड़ देंl हमारा अपने शरीर के साथ जो तादात्म्य है अर्थात यह शरीर ही मैं हूँ ऐसा जो भ्रम है उसे छोड़ देना हैl इस भ्रम से छुटकारा पाने के लिए श्रीगुरु बतलाते हैं कि ‘तत्वमसि’ अर्थात “वह तुम हो“l  वह ब्रह्म तुम हो, तुम शरीर नहीं होl यदि यह अभ्यासपूर्वक हमें स्वीकार्य हो जाये तो हमारा भ्रम दूर होगाl इसके लिये ‘पंचकोशविवेक’ नामक विवेक हमें करना होगाl

Friday, May 13, 2016

अनुग्रह - भाग ८

ऐसे मिथ्या जगत के प्रति मेरे मन में आसक्ति नहीं होना चाहिये और मेरे मन में ममत्व नहीं रहना चाहिये इस उद्देश को लेकर इन विचारों को बतलाया गया हैl अगर ये दो बातें जीवन से हट जाएँ, दूर हो जाएँ तो मनुष्य विरक्त हो जाता हैl

इस बारे में संत ज्ञानेश्वरमहाराज कहते हैं :-

“आणि मी माझे ऐसी आठवण l विसरले जयाचे अंतःकरण l
पार्था तो संन्यासी  l निरंतर ll“ ( ज्ञानेश्वरी ५ - २० )

अनुग्रह - भाग ७


“जगतसत्यत्व भ्रान्ति “ नामक एक भ्रान्ति है जिसका अर्थ है ऐसा लगना कि संसार जैसा दिखाई दे रहा है वैसा ही है और यह कि वही सत्य हैl यह एक भ्रान्ति है l इस भ्रान्ति को कौन हमारे ध्यान में लायेगा ? हम मन से, आचरण से कितने भी शुद्ध क्यों न हों, उसके कारण अधिक से अधिक हमारे मन में पाप वासना नहीं आएगी और हम गलत काम नहीं करेंगेl लेकिन हमें जो लग रहा है वह भ्रम, श्रीगुरु ने उस तरफ ध्यान दिलाये बिना हमारी समझ में नहीं आताl यह ‘जगत सत्य है‘  ऐसा लगना हमारे मन का मैल है यह हमारे ध्यान में नहीं आताl अतः श्री गुरु ठीक वही बात हमें बतलाते हैं कि यह संसार जैसा दिखाई देता है वैसा नहीं हैl वह सत्य नहीं हैl वह मायामय या मायिक हैl

तुरंत ही हमारे मन में प्रश्न उठता है कि मायिक किसे कहते हैं? “सदसद्विलक्षण अनिर्वचनीय“ अर्थात मायिकl ये कुछ बड़े-बड़े शब्द हैं इसलिए इनको समझ लेना आवश्यक हैl जो सत् से विलक्षण है और असत् से भी विलक्षण है उसे “सदसद्विलक्षण” कहते हैंl अब देखें कि विलक्षण शब्द का अर्थ है जो लक्षणों के अनुरूप नहीं हैl जो लक्षणों से मिलता जुलता न होl व्यवहार में हम कहते हैं कि कोई व्यक्ति विलक्षण है अर्थात साधारण रूप से व्यक्ति से हमारी जो अपेक्षा रहती है उसके अनुसार उसका बर्ताव नहीं होताl उसी तरह यह जगत सत् से विलक्षण है और असत् से भी विलक्षण हैl इसलिए वह सदसद्विलक्षण हैl इस प्रकार वह अनिर्वचनीय अर्थात मिथ्या हैl

सत् विलक्षण का क्या अर्थ है? सत् अर्थात सत्य l जो त्रिकालाबाधित है उसे सत्य कहते हैंl पहले था, आज है, और आगे भी रहेगा- ऐसा सत्य का लक्षण हैl इस लक्षण के अनुरूप या अनुसार जो होगा उसे ही सत्य कहते हैंl यह जगत या संसार पहले नहीं था, आज दिखाई देता है लेकिन आगे नहीं होगाl इसका अर्थ यह हुआ कि जगत त्रिकालाबाधित नहीं है अर्थात सत् विलक्षण हैl कुछ लोग कहेंगे कि यह विचार क्यों बतलाया जा रहा है? क्यों हम व्यर्थ ही दिमाग को तकलीफ दें? कृपा करके हमें सुख से जीने देंl लेकिन परमार्थ का यह सम्पूर्ण विषय मनुष्य के सुख से जी सकने के लिए ही हैl परमार्थ जीवन आनंदरूप होने के लिए, आनंदमय होने के लिए हैl परमार्थ का यह उद्देश ही जब विचारों में नहीं रहता तभी ऐसे उल्टे-पुल्टे प्रश्न किये जाते हैंl जगत सदसद्विलक्षण है यह बतलाने का क्या उद्देश है? यह जगत जो दिखाई देता है, वह सत्य नहीं है यह यदि हमें समझ में आ जाये, तो फिर उस जगत के लिए हमारी आसक्ति कम होने में मदद मिलती हैl जगत शब्द की व्याप्ति बहुत बड़ी हैl इसलिए हर समय इतने बड़े जगत का विचार करने की आवश्यकता नहीं हैl प्रत्येक व्यक्ति का जगत उसके अपने लिए सीमित होता हैl मेरा संसार या जगत मेरे सगे संबंधी, मेरे घर–संसार, व्यवसाय, मित्र इत्यादि तक ही सीमित हैl इसी जगत में मेरा रहना हैl उस जगत के प्रति मेरी आसक्ति रहती है, ममत्व रहता हैl इस आसक्ति और ममत्व से मुझे मुक्त होना हैl जिस समय मैं इससे मुक्त हो जाऊंगा, उस समय जो व्यथाएं और वेदनाएं उस आसक्ति और ममत्व के कारण मुझे हो रहीं थीं वे निःशेष हो जायेंगीl फिर मैं सुखरूप हो जाऊंगाl मैं आनंदरूप हो जाऊंगाl ऐसी व्यवस्था इस विचार की पृष्ठभूमि में हैl इस तत्वज्ञान का हेतु यदि ध्यान में लिया जाये तो इस तत्वज्ञान की आलोचना करने में हम नहीं पड़ेंगेl उसकी अधिक चीर–फाड़ नहीं करेंगे और श्रद्धा से उसे स्वीकार करेंगे।

तत्वज्ञान बतलाने का एक निश्चित उद्देश हैl यह संसार मिथ्या है, अनित्य है यह यदि मुझे ज्ञात होगा तो इस संसार में जो कुछ भी मैं ‘मेरा’ कहता हूँ उसके प्रति मेरी आसक्ति और ममत्व से मैं मुक्त हो जाऊंगा और मेरा आनंद मेरे साथ बना रहेगाl उस आनंद से मैं वंचित नहीं रहूंगा l ऐसी व्यवस्था अध्यात्मशास्त्र ने, परमार्थशास्त्र ने की हुई हैl हम सबको अच्छी तरह मालूम है कि आसक्ति में, ममत्व में बहुत दुःख होता है क्योंकि जिनके बारे में हमारी आसक्ति होती है उनकी हमसे और हमारी उनके प्रति कुछ अपेक्षाएं निर्माण होती हैंl ये अपेक्षाएं जब पूरी नहीं हो पातीं तब हमें दुःख होता हैl यह दुःख न होने पाए ऎसी व्यवस्था परमार्थशास्त्र में हैl इसलिये परमार्थशास्त्र का अध्ययन और अभ्यास करते समय जिस उद्देश के साथ साधना की जा रही है, उसका ध्यान हमेशा रखना चाहियेl अन्यथा वह तत्वज्ञान सिर्फ रटंत-विद्या बनकर रह जाता है, सैद्धांतिक चर्चा का, सैद्धांतिक विचारों के आदान-प्रदान का रूप लेकर रह जाता हैl उसके अलावा उसका कोई अर्थ नहीं रह जाताl यह उदाहरण देखें :-

“हमने गीता का अध्ययन नहीं किया है, समर्थ रामदासजी के ‘दासबोध’ ग्रन्थ को हाथ भी नहीं लगाया  लेकिन आपने दासबोध के दो सौ पारायण किये हैं, गीता आपको कंठस्थ है, उपनिषदों का आपने सांगोपांग अध्ययन किया है, फिर भी आप में और हममें कोई अंतर दिखाई नहीं देताl जैसे हम हैं वैसे ही आप हैं या जैसे आप हैं वैसे ही हम हैंl ऐसे में हमने यह सब अध्ययन न करके क्या खोया है और इतना सब कर आपने क्या हासिल किया है ?“ इस तरह के सवालों का कोई जवाब हमारे पास नहीं होताl

इसका कारण यह है कि जो कुछ हमने पढ़ा है उसका रूपान्तर हम साधना में नहीं कर पातेl हमारी बातों में सिर्फ सिद्धांतों का आग्रह रहता हैl पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष का, खंडन-मंडन का आग्रह और प्रतिपादन रहता हैl केवल बड़े बड़े शब्दों का प्रयोग करने की जिद रहती हैl लेकिन इससे कुछ भी हासिल नहीं होताl ऐसे समय यदि समाज हमसे ऐसे प्रश्न पूछता है तो हमारे पास उसके कोई उत्तर नहीं होतेl केवल उन्हें चुप कराने के लिये हम उत्तर देते हैं कि “हम में आतंरिक बदलाव हुए हैंl उनको आप समझ नहीं सकते या उनको आपके द्वारा समझने की कोई संभावना नहीं हैl” लेकिन आपके हिसाब से यदि आप में बदलाव हुआ है तो वह बाहर भी प्रकट होना चाहिये या नहीं? तत्वज्ञान के अभ्यास से आपके स्वभाव में, आपके आचरण में बदलाव अपेक्षित हैंl गीता में अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण को प्रश्न पूछा है :-

“स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव l
स्थितधी: किम प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम ll“  भगवद्गीता ( २- ५४ ) 

यहाँ तीन प्रश्न पूछे गए हैंl स्थितप्रज्ञ मनुष्य का वर्तन कैसा होता है? वह कैसे बोलता है? और कैसे चलता है? कुल मिलाकर देखें तो उसका जीवन किस प्रकार का होता है? इसका उत्तर भगवान श्रीकृष्ण ने दिया है कि “वह ऐसा- ऐसा  होता हैl“ इसका अर्थ यह निकलता है कि पहले वह वैसा नहीं था l स्थितप्रज्ञ बनने के बाद उसमें वे परिवर्तन आये और उसके बर्ताव में, उसके स्वभाव में और उसकी  भाषा में, बोली में परिवर्तन हुएl इसका मतितार्थ यही है कि वह अंतर्बाह्य रूप से बदल गयाl साधक में भी ऐसे बदलावों की अपेक्षा हैl जब यह अपेक्षा पूरी नहीं हो पाती तब संसार ऐसे ही प्रश्न पूछता है जिनका जवाब देते नहीं बनताl 

अनुग्रह - भाग ६

अनुग्रह का विचार करने के लिए जो ओवी हमारे सामने थी :-  

जेचि  क्षणी अनुग्रह केला l   तेचि क्षणी मोक्ष झाला l
बंधन काही आत्म्याला l     बोलों चि नये ll        ( दासबोध ८-७-५९ )
इसमें दूसरी पंक्ति में आत्मा पर जो बंधन बतलाया है वह हमारा भ्रम हैl इस भ्रम से मुक्त होने के लिये, इस भ्रम को समाप्त करने के लिये, हमें इन तीनों प्रकार की साधनाओं का उपयोग होता हैl संत ज्ञानेश्वर महाराज की इस सन्दर्भ में एक सुन्दर ओवी है :-
जेणें भ्रान्ति पासूनि हिरतले l गुरुवाक्यें मन धुतले l
मग आत्मस्वरुपी घातले l  रोउनिया ll           (ज्ञानेश्वरी ५ – ३४)
अर्थात जब भ्रांतियां मिट जाती हैं और गुरुवाक्य से मन धुलकर निर्मल हो जाता है, तब साधक का चित्त आत्मस्वरूप में स्थिर हो जाता हैl

अनुग्रह - भाग ५


          अनुग्रह का दूसरा स्तर इसके पहले ही बताया गया हैl कोई व्यक्ति बारह वर्षों तक अच्छी तरह से साधना करता हैl वह साधन चतुष्टय संपन्न भी हैl अत्यंत सदाचारी है, अपनी पद्धति से उसने नाम साधना भी की हुई है और अपनी समझदारी से कुछ ध्यान साधना की है, कुछ तत्वचिंतन भी किया हैl यह सब होते हुए भी उसकी साधना में एक ऐसा स्थान आता है कि संतोष नामक वस्तु फिर भी उससे दूर ही रहती हैl यह एक उंचा स्तर है जहाँ अनुग्रह दिया जाता है और  दूसरा निचला स्तर वह है जिसका वर्णन हम पहले ही देख चुके हैंl उस स्तर पर भी अनुग्रह दिया जाता हैl दोनों ही अनुग्रह देनेवाले की दृष्टि में समान हैंl लेकिन लेनेवाले की दृष्टि से बहुत बड़ा अंतर हैl अनुग्रह के सन्दर्भ में यह पहलू तत्वज्ञान का हैl

अनुग्रह के सन्दर्भ में दूसरा पहलू नामसाधना का हैl जिनका नाम हम ले रहे हैं उन रामजी का स्वरुप समझ पाने के लिए तत्वज्ञान की अत्यंत आवश्यकता हैl उन राम से मेरा क्या सम्बन्ध है, उनका और मेरा क्या नाता या रिश्ता है यह समझने के लिए तत्वज्ञान की आवश्यकता होती हैl वह तत्वज्ञान यदि एक बार भीतर पैठ पा ले, मजबूती से जड़ें जमा ले, तो उसके बाद राम का नाम लेने में और तत्वज्ञान न समझते हुए राम का नाम लेने में जमीन-आसमान का अंतर होता हैl इसके बारे में एक दृष्टांत देखते हैं :-

अनुग्रह - भाग ४


अब यह देखें कि शक्ति संक्रमण करने का जो समय होता है आधा या एक मिनिट या जो भी वो होता हो, उसका क्या लाभ है? उससे वास्तव में क्या होता है?

          एक बात जो होती है  वह यह कि शास्त्रों में जो एक असम्भावना नामक दोष बतलाया गया है, वह दूर हो जाता हैl तब प्रश्न उठता है कि असम्भावना का क्या अर्थ है? आत्मा नामक एक वस्तु है ऐसा हम श्रद्धा से मानते हैंl लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि आत्मा नाम की कोई चीज है ही नहीं और यदि है भी तो ‘मैं’ आत्मा होना संभव नहींl इसे असम्भावना कहते हैl यह शब्द हमें थोड़ा अलग सा लगेगाl जो सम्भव नहीं उसे रोजमर्रा  की भाषा में असंभव कहते हैंl उसी से यह असम्भावना शब्द बना हैl असम्भावना दोष का अर्थ है ऐसा लगना कि, ‘आत्मा नामक तत्व होना संभव नहीं है और यदि हो भी तो वह ‘मैं’ होना संभव नहीं है।‘ यदि अनुग्रह लेते समय शिष्य की अच्छी तैयारी हो और श्री गुरु भी वास्तव में अनुग्रह देने की योग्यता रखते हों (ये दोनों बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं), तो उस अनुग्रह लेनेवाले शिष्य को उस आधा या एक मिनिट तक कुछ एक विलक्षण आनंद मिलता है, विलक्षण अनुभव होता हैl उस विलक्षण अनुभव और उस आनंद के कारण उसका ऐसा विश्वास हो जाता है कि उसकी यह सोच कि आत्मा नामक तत्व है ही नहीं, गलतहैl बल्कि आत्मा नामक तत्व है जो उसकी अपनी समझ से परे कुछ हैl आत्मा हम जो समझ सकते हैं, जान सकते हैं, उस सोच से परे,  उस जानकारी से भी परे कुछ हैl जो मुझे समझ में नहीं आता ऐसा भी कुछ हो सकता हैl जो ज्ञान अब तक उसने प्राप्त किया उस ज्ञान के पार कुछ निश्चित रूप से है इतना उसके ध्यान में ला देने का काम इस अनुग्रह के अनुभव से हो जाता है l एक बार जब उसके ध्यान में यह बात आ जाती है कि ऐसी स्थिति हो सकती है, ऐसी अवस्था हो सकती है, ऐसा आनंद हो सकता है तो उसके बाद उसके अंतःकरण में बहुत बड़ी श्रद्धा निर्माण होती हैl इस प्रक्रिया में श्रद्धा के दो स्थान हैl

१.     जिसने अनुग्रह दिया उस पर श्रद्धा
२.     जिस तत्व के लिए अनुग्रह दिया गया उस तत्व पर श्रद्धा

अनुग्रह - भाग ३

          अब आगे प्रश्न आता है कि अनुग्रह किसे लेना चाहिये? अनुग्रह लेने में किसी को भी कोई रोक-टोक नहीं है l जिसे भी अनुग्रह लेने की इच्छा हो, अनुग्रह ले सकता हैl  क्योंकि देनेवाले का तात्विक दृष्टि से ‘मोक्ष‘ ही अंतिम ध्येय है, लेकिन स्वीकार करने वाले में न्यूनाधिक भाव रहता हैl यह न्यूनाधिक भाव अधिकार की दृष्टि से रहता है l संत तुकाराम ने कहा है :- अधिकार तैसा करू उपदेश l साही ओझे त्यासी तेंचि द्यावे ll अर्थात जिसका जैसा अधिकार हो उसे वैसा ही उपदेश करेंगेl उसके सर पर उपदेशों का, साधना का, उतना ही बोझ या भार रखेंगे जितना वह सह सकता होl

Thursday, May 12, 2016

अनुग्रह - भाग २

         अनुग्रह किस बात का किया जाय? परम्परा से जो ज्ञान मिला है, जो साधना पद्धति चली आ रही है, जो कुछ भी मंत्र चले आ रहे हैं, जो कुछ नाम-स्मरण चला आ रहा है, जो  भी प्रक्रिया चलती आ रही है वह सब आगे आने वाले को देना – ऐसा अनुग्रह का विशेष स्वरुप हैl परमार्थ क्षेत्र के विभिन्न सम्प्रदायों में इस प्रकार अनुग्रह दिया जाता है।  सम्प्रदाय में सम्यक ज्ञान प्रदान किया जाता हैl यह सम्यक ज्ञान पहले से चला आ रहा है और अनुग्रह देनेवाले को वह परम्परा से प्राप्त होता हैl इस प्रकार पहले से चला आ रहा सम्यक ज्ञान आगे आने वाले व्यक्ति को देने की परम्परा चलती रहती हैl इस परम्परा को सम्प्रदाय कहते हैंl सम्प्रदाय शब्द हम अखबारों में बार बार पढ़ते हैंl उदाहरण स्वरूप ‘सांप्रदायिक दंगे!’ अखबार में इस शब्द का व्यापक दुरूपयोग करने के कारण उस शब्द का सच्चा अर्थ कहीं खो  गया हैl सम्प्रदाय का अर्थ है सम्यक प्रदान और सम्यक प्रदान का अर्थ है जो पिछले समय से चली आ रही ज्ञान परम्परा है, साधन परम्परा है, वही परम्परा अगले व्यक्ति तक पहुंचानाl इसे कहते हैं सम्प्रदाय चलाना, सम्प्रदाय आगे ले जानाl सम्प्रदाय शब्द सुनते ही हमारे विचारों में मठ, आश्रम आदि संकल्पनाएँ तैरने लगती हैंl कोई संगठन होता है, उसका कुछ संविधान होता है, कुछ विशेष उत्सव होते हैंl मोटे तौर पर सम्प्रदाय का यही स्वरुप हमारे सामने आता हैl यह ठीक ही है और यही स्वरुप होना भी चाहिएl लेकिन केवल उतना ही होने से वह सम्प्रदाय नहीं बन जाताl सम्प्रदायों में एक और अनुभव की बात है कि एक मठ स्थापित होने पर सालभर में इतने - मान लो कि दस उत्सव विशिष्ट पद्धति से मनाये जाने चाहिये ऐसा निश्चित किया जाता हैl ऐसी कृतिशीलता की आदत लग जाने पर, उस कृतिशीलता में चिन्तनशीलता कहीं खो जाती हैl  इसका कारण है कि मठ चलानेवाला व्यक्ति सोचता है कि जो मुझे बतलाया गया है, वह मैनें कर दिया हैl निश्चित किये गए सभी दस उत्सव मैने ठीक से मनाये हैं,  अब मुझ पर कोई जिम्मेदारी बाकी नहीं बची, लेकिन यह सोच गलत है।  सम्प्रदाय को इसके अलावा कुछ अधिक करना जरूरी हैl वह है कि पहले से चला आ रहा सम्प्रदाय का ज्ञान, मन्त्र, साधना पद्धति आगे आने वाले शिष्यों को देना हैl

 

Tuesday, May 10, 2016

अनुग्रह - भाग १

(दि. ३.७.९३ और दि. ४.७.९३ को श्रीगुरुपुर्णिमा के अवसर पर, गुरुवर्य परमपूज्य डॉक्टर श्री श्रीकृष्ण द. देशमुख, निवासी ग्राम मुरगुड जिला कोल्हापुर, महाराष्ट्र, द्वारा दिये गये प्रवचनों का शब्दांकन l)

भाईयों और बहनों,

आज मुझे आप लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिये अनुग्रह विषय दिया गया है और उस सन्दर्भ में समर्थ श्री रामदास स्वामीजी की एक ओवी  (मराठी छंद का एक प्रकार), हमारे सामने प्रस्तुत की  गई हैl आइये हम लोग उसी के आधार से अनुग्रह विषय का विचार करें l

वह ओवी(पद) है :

जेचि क्षणी अनुग्रह केला l   तेचि क्षणी मोक्ष झाला l
बंधन काही आत्मयाला l बोलों चि नये ll   (दासबोध ८-७-५९)

अर्थात जिस क्षण अनुग्रह किया गया, उसी क्षण मोक्ष प्राप्त हुआl आत्मा को किसी भी बंधन के होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

अर्थ एकदम सरल है जो कि सामान्य अर्थ हैl  इस ओवी के अनुसार दो बातों का विचार करना चाहिये।

१. क्या सचमुच ऐसा होता है कि अनुग्रह मिलते ही उसी क्षण शिष्य मुक्त हो जाता है?

२. या इस बारे में कुछ अधिक विचार करना होगा।

ये दोनों ही विचार सही हैं।

Monday, April 11, 2016

The Theory of Maya - Last Part

Vedic scriptures have described different forms of adhyāsa (false attribution) such as -

The Theory of Maya - 3

Māyā is named differently according to six imaginary actions it performs. The alternate names for Māyā are-

The Theory of Maya - 2

So far we have seen the scope, expanse and manifestations of Māyā in daily life. It is also important to learn about the substratum (adhishthāna) i.e. Brahman on which Māyā functions.

The Theory of Maya - 1

In order to comprehend the theory of Māyā, it is necessary to first understand its scope, expanse, manifestations and substratum (adhishthāna) on which it is perceived and experienced.