Sunday, December 11, 2016

Wishes

Translation of Marathi poem Apeksha (अपेक्षा) from Pava
       
       Let me see the light of bright sunny day 
      Clouds in my mind, let them float away...
    
      Some rare odd ambitions
      And murky grey depressions
      Some ecstatic progressions, let them quickly stray...
    
      Some nostalgic impressions
      And breezing quick reflections
      Some heartfelt recollections, let them all allay...
    
      Petty, aimless, vain illusions
      I myself inflate hollow notions
      Life is replete with confusions, let me find the way...
    
      Palace filled with joys n distress
      I had built it just to impress
      Fancy it was truly baseless, let it wreck today...
    
      Soaking in the waves merrily
      Embracing the ocean gaily
      Figment it was for me only, let it fade away...
    
      Timeless, constant and eternal
      Formless, steady, immutable
      Boundless, quiet, perpetual
      Let me be that One principle, or take it all away...


|| Hari Om||
adaghbcb

Friday, December 9, 2016

हिन्दू धर्म - एक सामान्य रुपरेखा - ४

संन्यास आश्रम अंतिम आश्रम है जो वानप्रस्थ में तय किये गए ध्येय की प्राप्ति के लिए होता है l इसमें कर्म और उपासना का पूर्ण त्याग कर केवल ध्येय के अनुसंधान में जुट जाना है l अपने शरीर के साथ साथ सारे संसार के ममत्व का त्याग करना संन्यास का स्वरूप है l श्री ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं :-
मी माझे ऐसी आठवण  l विसरले जयाचे अंतःकरण  l
पार्था तो संन्यासी जाण  l निरंतर  l l (ज्ञानेश्वरी ५-२०)
अर्थात हे अर्जुन जिस व्यक्ति के मन में “मैं और मेरा” इन दोनों की याद भी नहीं है उसे ही संन्यासी जानों l संत ज्ञानेश्वरजी की संन्यास की यह व्याख्या सब कुछ  कह जाती है l संन्यास के प्रकार, आचार और दिनचर्या आदि का यहाँ विचार करने का कोई कारण नहीं है l आज के जमाने में जो संन्यास लेने वाले लोग हैं उन्होंने संन्यास को नया आयाम दिया है जो ठीक ही है l जो भी परिस्थितियाँ मिलें उसी में संन्यस्त वृत्ति से रहना संभव है और उतना काफी है l संन्यास लेना एक अत्यंत व्यक्तिगत बात है और उसे अपने लिए निष्ठापूर्वक सम्हाले रखना जरुरी होता है l उसका फल भी उसी को मिलता है l उसे संसार से उस सफल जीवन की मान्यता प्राप्त करने की कोई आवश्यकता नहीं होती l वह आत्मरत, आत्मक्रीड और आत्मतृप्त होता है l

चारों पुरुषार्थ हिन्दू धर्म का तीसरा अंग है l मनुष्य के परिपूर्ण जीवन की रचना कैसी होनी चाहिए इसका बहुत स्पष्ट मार्गदर्शन इस धर्म में मिलता है l जीवन की इतिकर्तव्यता ध्यान में रखकर उस गंतव्यस्थान पर पहुँचाने के लिए सुनिश्चित और सर्वांगीण विचार किसी भी दूसरी जगह नहीं मिलता l ये चार पुरुषार्थ हैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष l पुरुष अर्थात मनुष्य ने जो अर्थ प्राप्त करना है उसे पुरुषार्थ कहते हैं l अर्थ का मतलब है जिसे प्राप्त करना है वह प्राप्तव्य l उसमें भी मोक्ष सर्वश्रेष्ठ प्राप्तव्य होने के कारण उसे “परमार्थ” कहते हैं l अन्य तीन सामान्य अर्थ हैं l आरंभ में ही हमने देखा था कि वैदिक धर्म को “हिन्दू धर्म” नाम बाद में मिला l इस कारण धर्म शब्द का उच्चारण करते ही अन्य अर्वाचीन धर्मों का सन्दर्भ अकारण ही परन्तु अनिवार्य रूप से आता है l धर्म शब्द का वास्तविक अर्थ “कर्तव्य” है l उदाहरण के रूप में यदि हम क्षात्रधर्म शब्द  को लें तो उसका अभिप्राय ‘क्षत्रिय का कर्तव्य’ है l गृहस्थधर्म के अंतर्गत गृहस्थाश्रम के व्यक्ति के कर्तव्य बतलाये गए हैं l हमारे अपने अपत्य के जातककर्म से लेकर विवाह संस्कार तक और माता-पिता की देखभाल, सेवा से लेकर उनके श्राद्ध कर्म तक सभी कर्म कर्तव्य अर्थात धर्म ही कहलाते हैं l इन सभी संस्कारों की विधि के साथ ही उनका हेतु भी समझ लेना चाहिये l हेतु या उद्देश का ध्यान यदि रखा जाएगा तो विधि के लिए पर्याय मिल सकता है और हो सकता है l उदाहरण के रूप में श्राद्ध में मृत व्यक्ति का स्मरण और उसके प्रति कृतज्ञता महत्व की बात है l इसके साथ जो दान-धर्म जोड़ दिया गया है उसे समय के अनुसार बदला जा सकता है l मन्त्र के स्थान पर उसके अर्थ की भावना हमारे भीतर निर्माण होना सहजता से संभव है l मंत्र के बजाय भावना का मूल्य अधिक हो सकता है l वेदों के मन्त्रों का सामर्थ्य इस युग में कम हो जाने का निर्णय संत तुकाराम महाराज ने दिया है l
“तुका म्हणे काही  l  वेदा वीर्य शक्ति नाही  l l
अर्थात संत तुकाराम कहते हैं कि वेदों की सामर्थ्य शक्ति अब ज़रा भी बाकी नहीं बची l

इसलिए मानसपूजा की तरह मानसश्राद्ध भी किया जा सकता है l पुत्रधर्म, पितृधर्म, पत्निधर्म, भ्रातृ धर्म, पडोसी-धर्म, राजधर्म, राष्ट्रधर्म इत्यादि अनेक कर्तव्य रूप धर्म पुरुषार्थ हैं l धर्म पर ईश्वर का सबसे अधिक प्रेम होता है l धर्म की रक्षा करने हेतु वह निराकार से साकार हो जाता है l “धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे l यही उसकी प्रतिज्ञा है,व्रत है l संतों का भी धर्म पर अपार प्रेम होता है l संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर महाराज धर्म के गुण गाते हैं :- “अगा स्वधर्म हां आपला  l जरी कां कठीणु जाहला  l तरी हा चि अनुष्ठिला  l भला देखें  l l ( ज्ञानेश्वरी ३ – २१९ ) अर्थात अपने धर्म कें पालन में चाहे जितनी भी कठिनाइयाँ आयें लेकिन उसी का पालन करने में ही कल्याण है l धर्म पुरुषार्थ की नींव है l
दूसरा पुरुषार्थ “अर्थ” है l “अर्थस्य पुरुषो दासः” यह भीष्म पितामह का वचन प्रसिद्ध है l भीष्म की विवशता नैतिकता के धरातल पर आधारित होने के कारण उस महापुरुष के व्यक्तित्व की उंचाई बढ़ गई है l सामान्य व्यक्ति जब अर्थ का दास बन जाता है तो वह बौना हो जाता है l संत तुकाराम की अर्थ नीति पुरुषार्थ प्राप्त करवाने वाली है जब वे कहते हैं :

“जोडोनियां धन उत्तम वेव्हारें  l उदास विचारे वेंच करी  l lअर्थात अच्छे मार्ग से धन कमाना चाहिये और उसका संग्रह करना चाहिए l लेकिन उस धन को उदासीन वृत्ति से अर्थात बिना किसी आशा के, निरपेक्ष भाव से खर्च करना चाहिए अर्थात परोपकार में खर्च करना चाहिए l भारतीय संस्कृति दरिद्रता की प्रशंसा बिलकुल नहीं करती, उसके कोई गुण नहीं गाती बल्कि वैभव की अपेक्षा करती है l ऋग्वेद  में कहा है कि :- “उषस्तमस्यां यशदं सुवारं दासप्रवर्ग रविमश्व बुध्यं  l अर्थात हे उषा यश, वीरपुत्र, दास और अश्वयुक्त वैभववाली संपत्ति हमें भोग के लिए प्राप्त हो l श्रीसूक्त ‘अर्थ’ शब्द की भारतीय संकल्पना स्पष्ट करता है l कौटिल्य के अर्थशास्त्र में “अर्थ” विषय का व्यापक विचार प्रस्तुत किया गया है l

“काम” तीसरा पुरुषार्थ है जिसका स्वरुप ‘इच्छा’ है l संगीत, संभोग, स्वादिष्ट भोज्यपदार्थ और सुगन्धित द्रव्य आदि इच्छा के विषय हैं l सता, स्तुति, ज्ञान, कीर्ति और वैभव की भी इच्छा होती है l इसके लिए पैसा, शिक्षा, सामर्थ्य, गुण, मित्र इत्यादि की आवश्यकता होने के कारण ये भी इच्छा के विषय हैं l इन इच्छाओं या काम की पूर्ती पुरुषार्थ है l लेकिन काम को पुरुषार्थ का दर्जा प्राप्त हो इसके लिए उसे न्याय, नीति और धर्म की मर्यादा के बंधन में रहना चाहिए l इस विषय में स्मृति ग्रन्थ गीता में कहा है : “धर्माविरुद्धो कामोहं” अर्थात धर्म उल्लंघन न करने वाला काम भगवान् की विभूति है l  “परदारा माता समान” उक्ति इस बारे में मार्गदर्शक है l

चौथा पुरुषार्थ मोक्ष या परमार्थ है l यही परम पुरुषार्थ है l मोक्ष की कल्पना बंधन सापेक्ष है l बंधन वास्तविक न होकर कल्पित है l इसलिए मोक्ष भी कल्पित होता है l फिर भी जब तक कल्पित बंधन के आघात होते रहते हैं, तबतक बंधन और मोक्ष को वास्तविक ही मानना पड़ता है l इस बंधन से छुटकारा पाने के लिए वेदों के अनुसार कर्म और उपासना करनी पड़ती है l श्रीगुरु की शरण में जाकर ज्ञान अर्जित करना पड़ता है l कर्म से चित्त शुद्ध होता है और उपासना से वह शांत होता है l ज्ञान से चित्त चैतन्य में विलीन होता है l यह लीनता जब सहजता से होने लगे तब वह विज्ञान बन जाता है l बचे हुए प्रारब्ध के कारण जीवनमुक्ति की अवस्था प्राप्त होती है l संक्षेप में मोक्ष का ऐसा स्वरुप है l यद्यपि यहाँ पांच दस वाक्यों में यह बतलाया गया है, लेकिन इसके लिए दृढ़ निश्चय, गुरुकृपा, ईश्वरानुग्रह, शास्त्रकृपा और सदाचार के आधार से निरंतर चलने वाली साधना की आवश्यकता होती है l

हिन्दू धर्म केवल गर्व करने की बात नहीं है l साथ ही यह अनदेखी या नजरअंदाज करने वाली बात  भी नहीं है l  हिंदुत्व पूरे जीवन की जिम्मेदारी है l यह जिम्मेदारी जितने अधिक हिन्दू प्रतीति के साथ निभायेंगे उतना ही हिंदुत्व गौरवशाली और गरिमामय होगा l तब वह ताकत, रोटी, दवा और पैसे के प्रलोभनों से, प्रचार माध्यमों से विचलित नहीं होगा l ऐसा हिंदुत्व हम सभी को प्राप्त हो ऐसी ईश्वर चरणों में प्रार्थना है l

|| हरि ॐ ||
adaghbcb





Wednesday, December 7, 2016

हिन्दू धर्म - एक सामान्य रुपरेखा - ३

जिस समाज में वर्णों के अलावा अन्य जमातें निर्माण होती हैं, दुर्लक्षित होती हैं और बनी रहती हैं, उस समाज को घुन लग गई है ऐसा समझना चाहिए l जो धारा मुख्य प्रवाह में शामिल नहीं होती, वह किनारों का कटाव किये बिना नहीं रहती l इस बारे में उस धारा की भी कुछ जिम्मेदारियाँ होती हैं l जंगल, नदी और सागर का परंपरागत परिवेश चरितार्थ के कारण छोड़ा नहीं जाता l लेकिन सिर्फ इसी कारण से मुख्य समाज की प्रगति से ध्यान नहीं हटना चाहिए l वह प्रगति अपने तक खींच कर लाने का काम उन्हें करना ही चाहिए l कोई एक एकलव्य निर्माण होनेवाले समाज को स्वयं अपनी प्रगति करना संभव नहीं है l अंगूठा काटकर मांगनेवाला इतिहास जब हजारों साल तक ध्यान में रहता हो और उसे लगातार ताजा करना पड़ता हो, उस समय यह मानी हुई बात है कि ऐसे अंगूठे वाले एकलव्य बड़ी संख्या में निर्माण नहीं होते l अवसर मिलना चाहिए यह बात जितनी सच है, उतना ही यह भी सच है कि अवसर निर्माण करने पड़ते हैं l मालवण के एक होटल में कप-प्लेट धोने वाला सदू पाटिल मौके को खींचकर झपटकर विधायक स. का. पाटिल बना और आगे मुम्बई का बेताज बादशाह बना l दिल्ली में केंदीय मंत्री बना l  क्या उसे किसी ने अवसर दिया था? सभाओं, मोर्चों और घोषणाओं की बैसाखियों की उसे जरूरत नहीं पड़ी l आज जो महाराष्ट्र में उद्योगपति हैं, वे या उनके पूर्वज गरीब ही थे l उन्हें किसने मौक़ा या अवसर दिया था? सहकारिता क्षेत्र में आज बहुत सारे अवसर निर्मित हुए हैं l भ्रष्टाचार होते हुए भी आज इस क्षेत्र से बहुत सी आशाएं हैं l

चार आश्रम हिन्दू धर्म का दूसरा महत्वपूर्ण अंग है l मनुष्य के जीवन के चार स्वाभाविक पड़ाव यहाँ बतलाये गए हैं l उपनयन या यज्ञोपवित संस्कार से ब्रह्मचर्य आश्रम की शुरुआत होती है l आयु के करीब ६ से २४ वें वर्ष तक इस आश्रम का समय है l यह कालावधि आगे के जीवन की नींव है l विद्यार्जन के साथ साथ संयम, अनुशासन, आरोग्य आदर्शों का अनुकरण, अच्छी अभिरुचियाँ अपनाना और विकसित करना तथा उपासना जीवन के अत्यंत महत्वपूर्ण मूल्य हैं जिन्हें इसी काल में अर्जित करना पड़ता है l मुक्त सामाजिक व्यवस्था के मजनूं और केवल सामाजिक न्याय का विचार करने वाली तत्वपरंपरा के प्रक्षुब्ध युवक इन मूल्यों को समझने के लिए भी तैयार नहीं हैं l शिवाजी महाराज की राजधानी रायगड पर जाकर बीयर पीने वाले विद्यार्थी और अनेक उत्सवों में उपद्रव, दंगा-मस्ती और ऊधम मचाने वाले जवान लडके ऐसी संस्कृति से पैदा होते हैं l नशीले पदार्थ और विकृत वासनापूर्ति के चक्र में पडा हुआ विद्यार्थी जिस समाज में है ऐसा घुन लगा, सडा हुआ समाज किस प्रकार संतोष के साथ रह सकता है? ब्रह्मचारी की कल्पना जिस संस्कृति में नहीं पाई जाती, उस संस्कृति को कुमारी माता और अनाथ बच्चों की समस्या छिन्न-भिन्न कर देती है l इससे अनेक प्रकार के मनोरोगी तैयार होते हैं, अपराधी तैयार होते हैं l अपराध करने की प्रवृत्ति तैयार होती है l अनियंत्रित भोगविलास और व्यसन प्रतिष्ठा पाते हैं l इसके लिए बेहिसाब धन आवश्यक होता है l इसी से भ्रष्टाचार का राक्षस जन्म लेता है l यदि इस आश्रम के अनुरूप जीवन न हो तो सिनेमा के वाहियात बेहूदा श्रृंगार, अभिनेता और अभिनेत्रियों के लफड़ों से भरी सिनेमा संबंधित पत्रिकाओं, अपराध और असंयमित रक्तपात के घातक संस्कार कोमल मन पर होते है l
इसके बाद गृहस्थाश्रम करीब २५ से ५५ वर्ष की आयु तक होता है l विवाह, घर, व्यवसाय ही इस आश्रम की इमारत की नींव है l इस नींव पर संस्कृति, दानधर्म, सामाजिक जिम्मेदारियाँ और और राजनैतिक अहसास की दीवारें खड़ी हैं l अनेकों कर्तव्यों के स्तंभों पर यह इमारत सुरक्षित रहती है l क्रीडा, श्रंगार, कला, प्रवास, यात्रा, विनोद, साहित्य, प्रेम, वात्सल्य आदि की साज-सज्जाओं से वह सुन्दर बनती है l अधिकतर लोगों को इस आश्रम में प्रवेश  पाने की आतुरता रहती है जो उसके अपने समृद्ध जीवन की अपेक्षा में होती है l इस जीवन की स्वतंत्रता बड़ी रमणीय होती है l इसी आश्रम के दौरान आत्मविश्वास का निर्माण और उसकी अभिव्यक्ति होकर उसका अन्य लोगों को आधार मिलता है l व्यक्तित्व विकास की व्यावहारिक परिसीमाएं हासिल की जाती हैं l लेकिन इस इमारत पर यदि संयम और उपासना की छाया न हो तो यह तप जाती है l इसीलिए स्नान, संध्या, वैश्वदेव, नामस्मरण, तीर्थयात्रा, व्रत, त्यौहार, सामाजिक हित के कार्य इत्यादि की आवश्यकता होती है l परन्तु इस बारे में भोलेपन और ठगी को प्रोत्साहन न मिले इस बात का ध्यान रखना जरूरी है l चित्त की शान्ति का उद्देश उपासना के द्वारा साध्य हो रहा है या नहीं इस पर पूरी नजर रखनी होगी l

वानप्रस्थ आश्रम तीसरा पड़ाव है जिसमें गतिशील और क्रियाशील जीवन से निवृत्ति पाना है l आयु के ५५ से ७० वर्षों के बीच का यह काल है l परिवार, समाज और देश इनमें लिप्तता कम से कम करते जाना ही इस आश्रम की आवश्यकता है l अगली पीढ़ी के गृहस्थाश्रम में हस्तक्षेप न करते हुए जितनी हो सके और अपेक्षा हो उसके अनुसार मदद, मार्गदर्शन और प्रोत्साहन देना चाहिए l हमारे आधार से अगली पीढ़ी बढे यह बात स्वाभाविक और गौरवपूर्ण है l लेकिन इस बात का अहंकार होना और उसके लिए अगली पीढी हमारे उपकारों के नीचे दबी रहे ऐसी अपेक्षा रखना दुर्बलता का लक्षण है l समाचारपत्र पढ़ना, विवाह आदि समारोहों में शामिल होना, अपने दल बनाकर घूमने जाना, बीते दिनों की यादों में खो जाना और उनको हमेंशा दुहराते, बतलाते रहना, स्वास्थ्य की बेकार चिंता में समय बिताना,बच्चों, जमाई, बहुओं और नातीपोतों की बाललीलाओं का, शिकायतों का बखान करना, ताश के खेल में मगन रहना आदि बातें वानप्रस्थ आश्रम का जीवन नहीं है l वानप्रस्थ आश्रम में वन में बिताये जाने वाले जीवन जैसी जिंदगी जीना अपेक्षित है l महाभारत के युद्ध के पश्चात और पांडवों को राज्य प्राप्ति होने के बाद धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती जंगल में जाकर रहे l मृत और पराजित कौरवों के माता पिता और जीवित तथा विजयी पांडवों की माता इन तीनों ने अपने पिछले आश्रम वाले जीवन का नए जीवन के लिए त्याग कर दिया l स्वार्थ, ईर्षा और पुत्रमोह से भरा जीवन पीछे छोड़कर धृतराष्ट्र वन में चला गया l लज्जा, अन्याय और विजय का जीवन पीछे छोड़कर कुंती भी वन में चली गई l इस आश्रम में सादा, सुगठित, नियोजित, सुन्दर और नए ध्येय की ओर ले जानेवाला  जीवन अपेक्षित है l इस नए ध्येय की दिशा ब्रह्मचर्य और गृहस्थाश्रम की उपासना में खोजी हुई होना चाहिए l जिस ईश्वर की उपासना करनी है उसके स्वरूप को जान लेना चाहिए l जगत, जीव और ईश्वर का आपसी संबंध समझ लेना है और इन तीनों को निर्माण करने वाले ब्रह्म को जानकर उसके अनुभव के लिए साधना करना इस आश्रम का ध्येय है l गीता, उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रों के साथ संत साहित्य के अध्ययन, चिंतन और मनन से इस जीवन को एक नई ऊंचाई पर ले जाने की अपेक्षा है l इसके लिए श्रीगुरु की खोज कर उनके द्वारा बतलाई साधना निरंतरता से करते रहना यही इस आश्रम का जीवन है
क्रमशः...
 
 

Tuesday, December 6, 2016

हिन्दू धर्म - एक सामान्य रुपरेखा - २

                                शमो दमस्तपः शौचं क्षांतिरार्जवमेव च  l
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजं  l l  (१८ – ४२)
मन पर पूर्ण नियंत्रण, इन्द्रियों का संयम, ध्येयपूर्ण जीवन, अंतर्बाह्य पवित्रता, क्षमाशीलता, सरल स्वभाव, धर्म और धार्मिक संस्कारों का तांत्रिक ज्ञान, ब्रह्म का शास्त्रविहित ज्ञान, वेदों पर पूर्ण श्रद्धा इन गुणोंवाले दल को ब्राह्मण कहते हैं l यजन–याजन, अध्ययन, अध्यापन, दान और प्रतिग्रह ब्राह्मणों के कर्म हैं l पुरोहित का व्यवसाय ब्राह्मण के स्वभाव के अनुरूप है l स्वयं यज्ञ करना, औरों से करवाना, अपने स्वभाव के अनुरूप पठन-पाठन करना, दान देना और लेना ये सभी ब्राह्मणों के कर्म हैं l दान पर ही चरितार्थ की निर्भरता होने के कारण इस वर्ण के व्यक्ति धनाढ्य होने की संभावना बहुत ही कम होती है l पहले की कथाओं की शुरुआत “एक दरिद्र ब्राह्मण था ...” ऐसी हुआ करती थी l आज ऐसे व्यक्तियों की संख्या बहुत कम हो गई है l साहूकारी, खेती, व्यापार, उद्योग आदि व्यवसायों में ब्राह्मणों का प्रवेश होने से ब्राह्मण विशेष गुणसंपदा उनमें स्वाभाविक रूप से ही कम हो गई है l धूम्रपान, मांसभक्षण, मदिरापान इत्यादि भी उनके जीवन में पैठ पा गए हैं l साथ ही शम, दम, शौच, क्षमा आदि गुण कम होते जा रहे हैं l “ब्राह्मण साहूकार “ जैसे शब्द संयोजन में बड़ी विचित्रता है l साहूकारी वैश्य वृत्ति के व्यक्ति को ही करना चाहिये l साहूकारी के ब्याज लेना, रेहन या गिरवी रखना, वसूली करना, तगादा करना, कुर्की और जप्ती करना आदि कार्य ब्राह्मणवृत्ति से अत्यंत विसंगत हैं l ब्राह्मण का सत्ताधीश होने में भी अंतर्विरोध है l क्षमाशील और सरल मन के व्यक्ति सत्ता सम्हाल ही नहीं सकते l राजनीति के दांवपेंच, षड्यंत्र और कुचक्रों का ब्राह्मण वृत्ति से कोई मेल नहीं होता l ब्राह्मण के गुण अध्यापन के लिए और चिकित्सा के लिए अत्यंत अनुकूल हैं l आज ये व्यवसाय वैश्य वृत्ति से ग्रस्त हैं l उपयुक्त पदवी और बुद्धिमत्ता के साथ यदि ब्राह्मण के गुण शिक्षक या वैद्य और डाक्टर में न हों तो समाज में विद्यार्थी और मरीज के साथ संबंध सुसंगत और उचित नहीं हो सकते l उनमें अनेक तनाव पैदा हो जाते हैं l यही आज हो गया है और हो रहा है l समाज के हर स्तर से शिक्षक और वैद्य या डाक्टर तैयार होने में कोई बुराई नहीं है और न उसमें कोई आपत्ति हो सकती है l लेकिन उपर्युक्त गुण संपत्ति उनमें है या नहीं इसे अवश्य देखना चाहिए l पदवी, आरक्षण, सिफारिश और रिश्वत के सहारे बनने वाले शिक्षकों को बाद में इन गुणों का संपादन करने की कोशिश निश्चित ही करनी चाहिए l यदि ऐसा नहीं हुआ तो पूरक व्यवसाय, अध्ययन का अभाव, अशुद्ध उच्चारण, बुरी लतें, कामचोरी आदि बातों से ग्रसित अध्यापक समाज का बड़ा नुकसान करते हैं l l प्रज्ञा, प्रतिभा और प्रभाव का अभिरुचि और अभ्यासपूर्वक किया हुआ विकास अध्यापन के लिए अनिवार्य होता है l अच्छे अंक हासिल कर या आरक्षण के अंतर्गत चिकित्सा महाविद्यालय में प्रवेश प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को भी कोर्स के एक हिस्से के रूप में उपरोक्त ब्राह्मण वर्ण के गुणों को अपने व्यक्तित्व में ढालना चाहिए l वरना कठोर व्यवहार करनेवाले, व्यसनग्रस्त, लापरवाह, लोभी, ठग, फंसाकर रखनेवाले, अध्ययनहीन, झूठी नम्रता और मिठास जैसे दुर्गुणवाले वैद्य या डाक्टर तैयार होते हैं l वैद्य या डाक्टर और रोगी व्यक्ति का आपसी सामंजस्य नष्ट हो जाता है l बार बार क़ानून का डर दिखाया जाता है l इलाज का खर्च रोगी की औकात के बाहर की बात बन जाती है और स्वास्थ्य की रक्षा एक भयानक समस्या बन जाती है l गीता में आगे बतलाया है कि:- 
                                सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत  l
सर्वारंभा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः  l l (१८ – ४८)

गुणविशेष समुदाय से सुसंगत कर्म में यदि कुछ नापसंद बातें भी हों फिर भी उनका त्याग नहीं करना चाहिए क्योंकि अग्नि जैसे धुंएँ से दूषित होता है उसीतरह प्रत्येक के कर्म में कुछ न कुछ अनचाहा हिस्सा होता है और वैसे ही दूसरे के कर्म में भी कुछ भाग पसंदीदा होता है l ब्राह्मण के गुणों से युक्त व्यक्ति सत्ताधीश नहीं हो सकता l सत्ता के साथ मिलनेवाला वैभव, मानसम्मान और प्रसिद्धी कितनी भी आकर्षक क्यों न हो फिर भी उसे अपना ही काम करना चाहिए l क्षत्रिय के गुणों से संपन्न व्यक्ति को ब्राह्मण के गुणों वाले जीवन में शान्ति, सुचारुता और स्वास्थ्य का आकर्षण हो सकता है l क्षत्रिय के जीवन की परेशानियाँ, लड़ाइयाँ, जीवन की अनिश्चितता, षडयंत्र आदि बातें कितनी भी पीडादायक लगें, फिर भी उसने उन्हें संतोष के साथ स्वीकार करना चाहिए l ब्राह्मण और क्षत्रिय व्यक्ति को वैश्य के गुणसंपन्न व्यक्ति की अतुल संपत्ति, दानशीलता और लेनदेन वाले जीवन का आकर्षण होगा l वैश्य वृत्ति वाले व्यक्ति को ब्राह्मण की विद्वत्ता और क्षत्रिय के पराक्रम की चाहत या इच्छा हो सकती है l शूद्र के गुण वाले व्यक्ति को इन सभी का आकर्षण लगना स्वाभाविक है l चिंतामुक्त, बिना किसी जिम्मेदारीवाला, कर्तव्यदक्ष, जिसके बिना सभी का काम अटकता है ऐसे शूद्र के कर्म में दिलचस्पी हो सकती है l जिम्मेदारी से बचने के लिए पदोन्नति नकारनेवाले ऐसी ही वृत्ति के व्यक्ति होते हैं l किसी भी क्षेत्र में नोकरी करने वाले जब दूसरे क्रम के पद पर रहना पसंद करें तो वे शूद्रवृत्ति के होते हैं l ऐसे लोगों के बिना अर्थात ही कोई भी काम नहीं होता l सभी सरकारी और गैरसरकारी या निजी क्षेत्र की नोकरी करने वालों की शूद्रों में गणना होती है l फिर वे चाहे जिस किसी भी पद पर हों l नियोजित कार्य को पूर्णता तक पहुंचाना और उसमें मदद करना शूद्रों का काम है l अध्यापन, शासन, खेती, व्यापार और वैस्यवृत्ति के व्यवसायों के लिए नौकरों की सहायता की आवश्यकता होती ही है l  वे सब शूद्र होते हैं l केवल झाडू लगानेवाले, मजदूर और चपरासी को शूद्र नहीं कह सकते l शूद्र वर्ण के विषय में यह वस्तुस्थिति यदि ठीकतरह से ध्यान में रखेंगे तो एक तरफ तीन वर्ण और दूसरी ओर यह वर्ण ऐसी बराबरी की प्रतिष्ठा उन्हें मिल सकेगी l
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनं  l
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजं  l l  (१८ -४३)
शौर्य, तेज, धैर्य, सजगता, शत्रु को पीठ न दिखाना, दान और स्वामीभाव क्षत्रिय वर्ण के लक्षण हैं l शासक, सैनिक, पुलिस कैसे होना चाहिए यही बात इस श्लोक में बतलाई गई है l शूरता, वीरता उनके स्वभाव में ही होना चाहिए  l झूठा उत्साह काम नहीं आता l दरिद्री ब्राह्मण की तरह ही शूरवीर राजकुमार की कथाएं प्रसिद्ध हैं l जिसकी सिर्फ उपस्थिति से सामने वाले व्यक्ति पर प्रभाव पड़ता है उसे तेजस्वी कहते हैं l पराक्रम, त्याग, आत्मविश्वास, शासक होने का रोब या शान; इन सब बातों से तेज निर्माण होता है l धीरज और सजगता जैसे गुण यदि न हों तो युद्ध या शासन करना संभव ही  नहीं होता l रोब या शान का मतलब हेकड़ी, मगरूरी, घमंड, मस्ती या दूसरे को तुच्छ समझना नहीं है l क्षात्र गुणों के विकास के साथ आनेवाली वह एक सहज अभिव्यक्ति है l अपने पराक्रम से प्राप्त धन संपत्ति सुपात्र को दान करना क्षत्रिय का कर्त्तव्य ही है l यह पात्रता जाति पर निर्भर नहीं होती l गुणों के अनुसार निश्चित होती है l वैश्यवृत्ति के लक्षण इस प्रकार हैं :-
कृषि गौरक्ष्य वाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजं  l
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि  स्वभावजं  l l ( १८-४४)
खेती, पशुपालन, व्यापार, उद्योग, बैंकिंग, कर-व्यवसाय इत्यादि का वैश्यवृत्ति में समावेश होता है l इन सभी के लिए मेहनत, नियोजन, सततता या निरंतरता और ज्ञान की आवश्यकता होती है l वैश्यवृत्ति सामान्य या हल्के दर्जे का काम है ऐसी बहुत बड़ी गलतफहमी थी और अब भी है l आज का पढा-लिखा युवा वर्ग खेती और पशुपालन को कम दर्जे का काम समझने लगे हैं l व्यापार और उद्योग में अच्छी कमाई होने के कारण उसका आकर्षण अधिक लगता है l इस काम में यदि “गुणसंपत्ति” में कमीं हो तो नाकामी हाथ लगती है l उद्योगपति का मतलब शानदार बंगला, इंपोर्टेड कारें, पांचसितारा होटलों में दावतें आदि जैसा समीकरण एक धोखा है l इन सबके पीछे कड़ी मेहनत, उत्साह, साहस, ज्ञान, योजना, प्रसंगावधान, अध्ययन, दूरदृष्टि आदि गुण होने चाहिए l योग्य काम के लिए योग्य व्यक्ति चुनकर उसे जिम्मेदारी सौंपने का कौशल चाहिए l धोखा या खतरा मोल लेने का माद्दा होना चाहिए l कायदे क़ानून की जानकारी होना चाहिए l शासक वर्ग को अपने अनुकूल करने की महारत होना चाहिए l मजदूरों, कर्मचारियों की देखभाल करना आना चाहिए l यह सारी गुण संपदा जब धन संपत्ति और वैभव दिलाती है, उस समय यदि उसे दान देने की प्रवृत्ति का साथ ना मिले तो जनता के रोष का, गुस्से का पात्र बनना पड़ता है l उसी से खर्चों के अनेक मद तैयार होते हैं l सच्ची सामाजिक जिम्मेदारी के तहत दान और चन्दा देना जरुरी होता है l विद्वानों की सहायता करनी होती है l कला, क्रीडा और विज्ञान की प्रगति के लिए लगन से काम करना होता है l धर्म की रक्षा की बड़ी जिम्मेदारी भी इन्हें ही उठानी होती है l
क्रमशः...

Monday, December 5, 2016

हिन्दू धर्म - एक सामान्य रुपरेखा - १

वेदों की शिक्षा का गर्भितार्थ ध्यान में रखकर रचित स्मृतियों के अनुसार जीवन जीने की पद्धति को हिन्दू धर्म कहते हैं l “वैदिक” शब्द के स्थान पर हिन्दू शब्द अनाहूत रूप से आया है l आज विद्यमान इस्लाम और ईसाई धर्मों का सन्दर्भ वेदकालीन समय में नहीं होने के कारण वैदिक धर्म का अलग से नामकरण करने का प्रश्न ही नहीं था और कोई अन्य कारण भी नहीं था l इस्लाम के कुरान और ईसाईयों के बाइबल की तरह हिन्दुओं का धर्मग्रन्थ “स्मृति” हैं l मनु, याज्ञवल्क्य ,भगवद्गीता आदि स्मृतियाँ हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ हैं l सभी धर्मों के धर्मग्रंथों की प्रामाणिकता के विरुद्ध विद्रोह हुए हैं l उसीतरह स्मृतिग्रंथों के विरुद्ध भी विद्रोह हुए हैं और अभी भी हो रहे हैं l स्पिनोझा और व्होल्तेयर ने ज्यू और ईसाई धर्मग्रंथों को चुनौतियाँ दी थीं l

आज भी करीब करीब बीस स्मृति ग्रंथ उपलब्ध हैं l कितने ही ग्रन्थ नष्ट हो चुके हैं पर इसकी कोई जानकारी भी उपलब्ध नहीं है l लेकिन इससे एक बात निश्चित रूप से ध्यान में आती है कि कोई भी स्मृति एकमेव ग्रन्थ न होकर उसमें बदलाव की संभावना थी l उस समय यदि ऐसी संभावना थी तो आज भी वैसी संभावना रहने में कोई आपत्ति या विरोध नहीं होना चाहिये l इस वस्तुस्थिति का ठीक से विचार सनातनी लोग कदाचित नहीं कर पाये हैं l कलियुग के लिए पाराशर स्मृति है ऐसा उसी स्मृति ग्रंथ के प्रारंभ में कहा गया है l
“मानुषाणां हितं धर्मो वर्तमाने कलौ युगे  l
शौचाचारस्तथावच्च वाद सत्यवती भुज  l l
अर्थात मनुस्मृति को गतकाल की स्मृति समझने में क्या आपत्ति हो सकती है ? पहले की सभी स्मृतियाँ “सर्वे नष्टा कलौ युगे”  अर्थात इस कलियुग में नष्ट  हो गई हैं – ऐसा वही स्मृति आगे बतलाती है l आपद्धर्म ही युगधर्म होने की स्थिति कलियुग में अपेक्षित होते हुए भी, उसे मन से स्वीकार करने की आवश्यकता है l यदि समझौते की भावना समाप्त हो जाती है तो फिर संतोष टिक नहीं पाता l इसके आगे की स्मृतियाँ अधिकाधिक वस्तुस्थिति के अनुरूप होती गईं l शंख स्मृति कहती है :-वृत्या शूद्र सुस्तावाद्विज्ञेयास्ते विचक्षणै:”  l  प्रत्येक व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है इस बात का जानकार लोगों को ज्ञान है l संस्कार से वह द्विज बनता है l इस संस्कार शब्द का अर्थ क्या सिर्फ यज्ञोपवित (जनेऊ) जैसे मन्त्र संस्कार जितना ही लिया जाय? नहीं l संस्कार का अर्थ है आदर्शों के साथ एक व्यक्तित्व बनाने की परियोजना l क्या यज्ञोपवित संस्कार का आज की शिक्षा पद्धति के साथ कोई सम्बन्ध है? नहीं है l परियोजना के प्रभाव स्वरूप ही वास्तव में एक व्यक्ति बनता है l अर्थात संस्कार का अवसर यदि मिले तो परिवर्तन हो सकता है l यह बात स्मृतियों में स्वीकार्य है l प्रगति या अधोगति दोनों ही परिवर्तन हैं l यदि संस्कारों पर ध्यान नहीं दिया जाय तो उन्नत व्यक्ति अधोगति को पहुंच सकता है और यदि संस्कार किये जाएँ तो निम्न स्तर का व्यक्ति भी उन्नत हो सकता है l यह बात खुले मन से स्वीकार करना चाहिये l

स्मृति को हिन्दू धर्म के ग्रन्थ के रूप में स्वीकार करने के साथ ही साथ परिस्थिति का विचार करके आज भी चार वर्ण, चार आश्रम और चार पुरुषार्थों पर आधारित जीवनपद्धति को धर्म के रूप में स्वीकार करना होगा l “आचारः प्रभवो धर्मः”  l धर्म की यह व्याख्या व्यक्ति के आचरण की दिशा बतलाती है l “धारणात धर्मः l” व्याख्या बतलाती है कि समाज जिसके आधार से अपने हित के लिए स्वयं बंधन में रहता है वही धर्म है l पहली व्याख्या जहाँ व्यक्तिनिष्ठ है वहीँ दूसरी व्याख्या समाज या समष्टिनिष्ठ है l ये व्याख्यायें संदिग्ध न होकर लचीली हैं l इस बंधन में कारावास की कल्पना नहीं है वरन वह न्याय, नीति और संयम का स्वीकार्य बंधन है l यह बंधन जब अत्याचारी बन जाता है उस समय वह धार्मिक तानाशाही बन जाता है l धर्म को देश के संविधान, क़ानून और अन्य नियमों का पूरक होना चाहिए l धर्म के बंधन का उल्लंघन कर जो अपराध हों वे शासन द्वारा भी दंडनीय होना चाहिए l धार्मिक विधिविधान यदि सामाजिक न्याय के विरोधी हों तो सामाजिक न्याय ही श्रेष्ठ माना जाना चाहिए l

चार वर्णों वाली अवधारणा आजकल बहुत बदनाम हो गई है l अपने स्वभाव की विशेषता के कारण बने समूह को वर्ण कहते हैं और जाति व्यवसाय के अनुसार निश्चित की जाती है l स्वभाव और व्यवसाय में विसंगति के कारण वर्ण और जाति में बहुत बड़ी गफलत हो गई l मनुष्य की प्रवृत्ति का किसी विशिष्ट दिशा की ओर होने वाले झुकाव को स्वभाव कह सकते हैं l स्वभाव की कुछ विशेषता, ढंग और व्यवसाय अनेक परिवारों में अभी भी चलता आ रहा है ऐसा दृष्टिगत होता है l उनसे ही जाति और परंपराएं निर्मित हुईं l आज भी नेता का पुत्र नेता, खिलाड़ी का बेटा खिलाड़ी, अभिनेता या अभिनेत्री  की संतान अभिनेता या अभिनेत्री, डाक्टर का बेटा डाक्टर, व्यापारी का बेटा व्यापारी आदि की तरह से परंपरा चलते रहना स्पष्टता से दिखाई देता है l बढई, कुम्हार, चमार, लुहार, पुरोहित इत्यादि जातियाँ इसीप्रकार बनीं l इन जातियों की जो दीवारें बन गईं वे एक विशेष भारतीय समस्या है l छोटी छोटी बाड़ें दुखदाई नहीं होतीं वरन वे हितकारी होती हैं ऐसा सोचना गलत नहीं होगा l ऐसी छोटी बाड में किसी विशिष्ट कला या व्यवसाय को शुरूआत से ही प्रोत्साहन, मार्गदर्शन और उचित वातावरण प्राप्त होता है l  इस बारे में कोई शंका नहीं की जा सकती l लेकिन ये बाड़ें जब दीवारें बन जाती हैं और अधिकाधिक ऊँची, तप्त और कंटीली बन जाती हैं, उससमय केवल खीज या चिढ पैदा करनेवाली स्थिति निर्माण होती है l वहाँ स्वार्थ में अंधत्व की पराकाष्ठा होती है l विश्वस्तर पर भी अलग अलग सन्दर्भों में ऐसी दीवारें खडी करने की कोशिशें होती रहती हैं l लेकिन सामान्य व्यक्ति को वे नजर नहीं आतीं इसलिए उन दीवारों के प्रति खीज नहीं होती l अमेरिका, यूरोप, चीन और जापान ने व्यापार की दृष्टि से बड़ी बड़ी चारदिवारियाँ खड़ी कर ली हैं l वहीँ दक्षिण अफ्रिका में वंशवाद की दीवारें थीं l ये सभी ध्वस्त होने की कगार पर हैं l इन अप्राकृतिक दीवारों का और दूसरा क्या हश्र होगा? लेकिन मनुष्य स्वभाव से स्वार्थी है यह बात कालातीत है l
“चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः  l (४ – १४) 
इन शब्दों में गीता स्मृतिग्रंथ चार वर्णों की उत्पत्ति बतलाता है l वर्ण गुणों से निश्चित होता है या जन्म से इस बात का विवाद आज तक चला आ रहा है l लेकिन इस विवाद की तीव्रता इस विवाद तक ही सीमित है क्योंकि किसी भी एक वर्ण के गुणों के अनुसार हुबहू ठीक वैसा ही व्यक्ति मिलना कठिन हो गया है l फिर भी संसार का सामाजिक जीवन अच्छी तरह से चलते रहने के लिए उस विशिष्ट गुणवाले समुदायों की या वर्णों की आवश्यकता तो निश्चित रूप से है ही l यह आवश्यकता एकबार मान्य या स्वीकार्य हो तो हिंदूधर्म की एक विशिष्टता पूरीतरह ध्यान में आयेगी l गीता के अठारहवें अध्याय में इन गुणविशेष समुदायों के दल कैसे होते हैं इस बात का और उन गुणों से सुसंगत आचरण का भी वर्णन है l
क्रमशः...