Friday, July 1, 2016

संप्रदाय - अन्तिम भाग

गीता, उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र में भी संप्रदाय के सन्दर्भ में समाज की मूलभूत आवश्यकताओं की संगठन के माध्यम से पूर्ती करने का कोई विचार नहीं हैl आज की परिस्थिति में ऐसा सन्दर्भ सहायक होगा इस दृष्टि से यदि कोई छिद्रान्वेशी उसमें वैसे विचार खोज निकालने की शर्त लगा ले तो बात और हैl ज्ञानेश्वरी ग्रन्थ में ऐहिक वैभव के लिए जो भी उपाय बतलाया है वह व्यक्तिगत स्तर पर है न कि संस्था या संगठन के स्तर परl 

संप्रदाय - ५

अब साधना के बारे में विचार करेंगेl तीर्थयात्रा, देवता, ग्रन्थ इत्यादि बातें वास्तविक साधना में मदद करती हैंl इन साधनाओं में संप्रदाय के अनुरूप काफी अंतर हो जाता हैl फिर भी स्थूलरूप से नाम, ध्यान, चिंतन और पृथक्करण के रूप में चार वास्तविक साधन बताये जा सकते हैंl सभी साधनाओं  का इन्हीं में समावेश होगाl सामान्यतः निम्न चार साधना भेद बतलाये जा सकते हैं :-

संप्रदाय - ४

भारतीय तत्वज्ञान में कर्तव्य और आसक्ति के बीच में कभी भी कोई भ्रम, गलतफहमी या गडबडी नहीं पाई जातीl सैरसपाटा, विवाह, खेलों की प्रतियोगिताओं के लिए संसार के नित्यक्रम से यदि समय निकालना संभव है, तब परमार्थ के लिए समय क्यों नहीं निकाला जा सकता? ऐसी यात्राओं के स्थान पर हजारों-लाखों भक्तों का मेला देखकर श्रद्धा और दृढ़ हो जाती हैl स्वयं संत ज्ञानेश्वर और संत नामदेव ने एकसाथ यात्रा कर ऐसा आदर्श स्थापित किया थाl श्री समर्थ रामदास स्वामी, आद्य शंकराचार्यजी ने भी संपूर्ण भारत का भ्रमण किया थाl  

संप्रदाय - ३

समुद्र घनगंभीर आवाज करता है परन्तु उसका पानी खारा होता हैl वह उसमें कूद जानेवाले को डुबो देता हैl संत भी समुद्र की भांति गंभीर(गहन) उपदेश देते हैंl संत विश्वनिर्माण की, मानव जीवन की और परमेश्वर की गहनता समझाकर बतलाते हैंl उनका अंतःकरण अमृत से लबालब भरा रहता हैl उनकी शरण में जाने से वे भवसागर से तार देते हैंl

संप्रदाय - २

मोह का क्या अर्थ है? भ्रष्टाचार का मोह, परस्त्री का मोह, निंदा करने का मोह आदि मोह होते हैंl व्यावहारिक जीवन में मोह प्रसिद्ध हैंl परन्तु इन मोहों का क्या कारण है?

संप्रदाय - १

संप्रदाय अर्थात परंपरा पहले से और पीछे से आगे की ओर जो चलता आ रहा है ऐसा ज्ञानl
अनेक लोगों को ऐसा लगता है कि संप्रदाय केवल परमार्थ का ही होना चाहिएl परन्तु ऐसा कोई नियम नहीं हैl संगीत कला के घराने ( उदाहरणार्थ : किराना, ग्वालियर, जयपुर इत्यादि), कुश्ती की कुछ परंपराएं (भारतीय, जापानी, ग्रीकोरोमन इत्यादि) और साहित्य की शैलियाँ (जैसे: छायावाद, गूढ़वाद, वास्तववाद, दलित आदि ) भी संप्रदाय ही हैंl